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| सुशोभित की उम्दा क्लिक | |
(एक )
मेरे हृदय में एक अदृश्य कोशिका है, जो धागे की गिटी की तरह पृथ्वी को लपेटे हुए है. मेरे मस्तिष्क में एक अदृश्य ट्यूमर है, जिसका आकार रौसेटा पत्थर से भी बड़ा है. मेरे गर्भ में एक अदृश्य बच्चा है,जिसके पिता को भूलने की बीमारी है. मैं एक अदृश्य उंगली पकड़ कर सदियों से नींद में चल रही हूँ, उस उंगली के चारों ओर दृश्य बिखरे पड़े हैं.
'बिग बैंग' सिद्धांत से ग्रह जन्मे होंगे. संसार उस अदृश्य उंगली के चारों ओर घूमता 'सुदर्शन' है.
( दो )
नाचने वाली का मुजरा ही उसका कीर्तन है. अपना कीर्तन भी ईश्वर के सामने मुजरा ही है.
(तीन )
अपनी लाल किताब में जीवन लिखते हुए ईश्वर ने पेड़, पहाड़, चाँद -सितारे, चिड़िया, नदिया, झरने ,समन्दर, सब लिख डाला.
.................. और फिर पहली बार मृत्यु शब्द लिखते ही उसने ने अपनी कलम की नोक तोड़ दी !
7 comments:
बहुत बढिया
विचारणीय
उम्र के खेल में इक तरफ़ा है ये रस्साकशी
इक सिरा मुझको दिया होता तो कुछ बात भी थी
मुझसे तगड़ा भी है और सामने आता भी नहीं...
बहुत खूब...लिखा...बाबुशा...
विचारोत्तेजक
सुशोभित की बढ़िया क्लिक!
सोचने भर से कहाँ मुक्ति मिलती है, जीवन झेलना पड़ता है।
वाह!
शानदार।
कविता पढ़ कर बहुत अछ्छा लगा.....शुक्रिया....
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