Sunday, February 26, 2012

माइग्रेन, ट्राइका और एक निहायत ही दो कौड़ी की बात

मीत  के कैमरे से ..

मैं कहती हूँ किसी इश्तेहार का क्या अर्थ बाक़ी है
कि जब हर कोई चेसबोर्ड पर ही रेंग रहा है
आड़ी- टेढ़ी या ढाई घर चालें तो वक़्त  तय कर चुका है
काले सफ़ेद खाने मौसम के हिसाब से
आपस में जगह बदलते हैं

फिर क्यों झूठे सत्य की तलाश में भटका जाए

एक नट सदियों से रस्सी पर चल रहा है
न उसने संतुलन का भ्रम दिखाया
न हवा में शरीर फ़ेंक कलाबाजी का नमूना पेश किया
उलटे सिक्के फेंकने वाले तमाशबीनो की ओर उछाल दिया
फोंटाना द त्रेवी का रूट मैप

पानी का देवता सिक्कों की माला पहन तुम्हे दुबारा बुलाता है
हर दुःख दरकिनार कर तुम चल पड़ते हो
अपनी ही परछाईं देखने
जबकि कहीं का भी पानी तुम्हें अपनी ही शक्ल दिखाता है
पर कामना से भरे हुए तुम
रोम के पानी में ख़ुद को बेहतर पाते हो

झूठ है तो दुनिया क़ायम है
सत्य कोयले की खदान में लगी आग है
याद है..
एक बार पृथ्वी आग का गोला थी ?

मेरे मकान की ईंटें कब की पक चुकी हैं
गर्म फ़र्श पर नंगे पाँव चलना अब मुश्किल है
मेरे कमरे में अब आग की लपटों की दीवारें होंगी
राख के ढेर पर बैठे हुए मैं
भटकी हुयी 'एलिस' को राह बता दूंगी
मोड़ का आख़िरी घर उसका है
जबकि पहला घर और बीच के सारे घर भी उसके ही हैं

पूरी दुनिया को नींद में चलने की बीमारी है
उस डॉक्टर  को भी जो नींद में पर्ची पे पर्ची लिखे जा रहा है   !


  

10 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुंदर ☺

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

बडी गहरी बातें कह गयीं आप...

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..की-बोर्ड वाली औरतें।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन सा जगत दिखायी देता,
कहीं कोई मन भी हर लेता,

Mamta Bajpai said...

adbhut hai

Atul Shrivastava said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

avanti singh said...

gahre arth khud me sjaaye uttam rachna

Kailash Sharma said...

बहुत गहन चिंतन...

raju said...

बहुत सुंदर कविता......

Mamta Bajpai said...

सुन्दर है

jyotsna said...

aap ki signature babasha hi apne aap may ek kavita hai