Wednesday, May 23, 2012

कच्ची नींद का पक्का पुल और अ मा न

ब्रेन्डा बेहर की द ब्रिज टु एवरीव्हेयर   
वह बिना पटरियों का पुल है, जिस पर धडधडाते हुए स्टीम इंजन वाली एक  ट्रेन गुज़रती है. जलते हुए कोयले की गंध वातावरण में चिपकी रह जाती है. कुछ चिपचिपाहटें पानी की रगड़ से भी नहीं धुलतीं.

चौड़े कन्धों वाला वो लड़का  अक्सर पुल पर आता है और देर तक ठहरा रहता है. चमकती हुयी उसकी आँखों में तलाश और ठहराव  के भाव साथ - साथ दिखते हैं. कॉलरिज के ऐलबेट्रॉस का नाखून ताबीज़ की तरह उसके गले में हमेशा बंधा रहता है.  देर तक नदी को निहारता हुआ वो ख़यालों के जंगल में कुछ तलाशता है. ऐसा लगता है जैसे उसकी उसकी आँखें नदी की देह के भीतर जल रही आत्मा की लौ  खोज रही हैं. फिर पुल के ऐन बीचोबीच ठहर कर वो नदी में पत्थर फेंकने लगता है.  अपने होंठ  गोल करके हवा के तार पर 'बीटल्स' की धुन छेड़ते हुए वो लापरवाही से  ट्रेन के पैरों के निशान पर एक नज़र डालता है और मुंह फेर लेता है.  नींद की घाटियों में देर तक उसकी सीटी की आवाज़ गूंजती है.  कभी- कभी वो भूखी मछलियों के लिए नदी में आटे की गोलियां डालता है और मछलियों की दुआएं जेब में डाले पैरों से पत्थर ठेलता हुआ सांझ के धुंधलके में गुम हो जाता है.

इन घाटियों में  चलने वाली पछुआ हवाओं के बस्ते में बारिशें भरी हुयी हैं. जब-जब ये मतवाली हवाएं अपना बस्ता खोलती हैं, नदी का पानी पुल तक चढ़ जाता है.

इंजन का काला धुंआ  ट्रेन के पीछे सड़क बनाता चलता है. बारिश में सडकें बदहाल हो जाती हैं . धुंए की सड़क आत्मा के इंद्र के कोप से मिट जाती है.


मछलियाँ घर बदलने की जल्दी में है. नदी के पानी की दीवारें छोड़ कर जल्दी ही किसी मछेरे के जालीदार दीवारों वाले घर में रहने चली जाती हैं. मछलियाँ दीवारें तोडती नहीं बल्कि घर छोड़ देती हैं.

नींद में  दिशाएं अपनी जगह बदलती रहती हैं. यह पता ही नहीं चल पाता  कि सीटी से 'बीटल्स' की धुनें बजाने वाला लड़का किस दिशा से आता है और कहाँ गुम हो जाता है. पीछे छूट जाता है अकेला खड़ा एक पुल, जलते कोयले की गंध और पुल के ऊपर से बह रहा नदी का पानी.

मैं कोयले की गंध  को खुरच-खुरच कर निकालती हूँ और उसकी सूख  गयी पपड़ियों को चूम लेती हूँ.  उस सूखेपन को अपनी मुट्ठी में मसलकर उसकी राख़ अपने माथे से लगाती हूँ हर दिन....


स्वप्न तुम्हारी और मेरी आँखों के बीच बना पुल हैं.


Thursday, May 17, 2012

मेरे केंचुए, तुम्हारी मछलियाँ....

देबरा सिज़ोन की  पेंटिंग

वह नींद में बनी हुयी जगह है, जहां से मैंने चलना शुरू किया था.मैं नींद की यात्री हूँ. मेरी नाभि के चारों ओर एक केंचुआ रेंगता रहता है. नींद मेरे जीवन का ठेठ अनुवाद करती है.

मेरे भीतर फैला हुआ यह लिसलिसापन तुम्हें खो देने का भय है.  मैं नींद में ही केंचुए पर मुट्ठी भर नमक छिड़क देती हूँ. इस यात्रा के हर ठहराव पर मुझे अपने पैरों के आस -पास बिखरा हुआ नमक दिखाई देता है. नानी कहती थीं कि धरती पर नमक नहीं गिराना चाहिए वर्ना  भगवान आँखों से नमक उठवाता है.

नींद में कितने ही टूटे पुल मैं पार कर चुकी हूँ.  मेरे पैरों से रिसते लहू से बीहड़ जंगलों के बीच एक राह बन गयी है. मेरी यात्रा बार - बार बाधित होती है. तुम सूखे पत्तों को फूँक मारकर हवा में उड़ा देते हो और तुम्हारे मुंह की हवा से सांस लेकर पत्ते फिर से जी उठते हैं.

हरे रंग के कन्धों पर अदृश्य भुजाएं होती है, जो ठहरे हुए यात्री का हाथ थाम कर आगे की ओर खींचती है.

तुम नींद के उस पार खड़े हो.
जागते हुए मेरी पीठ पर मछली- सा एक चुम्बन मचलता है.
यह तुम्हारे  होने का उत्सव है.

मैं दुनिया के सारे केंचुओं को मार डालना चाहती हूँ.
तुम दुनिया के सारे सूखे पत्तों को हरा कर देना चाहते हो.

जबकि मेरी आँखों में हिलोरे भरते नमक के अथाह समंदर का रहस्य नानी बरसों पहले बता गयी थीं.

( नींद में. )

Thursday, May 10, 2012

ख़ुशामदीद

सुबह 


सबसे पहले आकाश के कोरे पन्ने पर  ईश्वर ने 'दिन'  लिखा.

लाल रंग में कलम डुबो कर उसने सूरज की हिज्जे लिखी. सूरज का एक - एक रेशा पन्ने पर खींचकर उजास भरी इबारतें उकेरीं.  सात घोड़ों के भव्य रथ पर सवार देवता ने जैसे ही धूप की हल्दी से पन्ने पर तिलक लगा कर शुभारम्भ का नेग किया, आसमान से धरती तक पीली - चमकीली झालरें लटकने लगीं. इस तरह कई दिनों तक दिन चला और दवात में जमा लाल रंग स्याह पड़ने लगा.

इधर ईश्वर की वर्णमाला के सारे अक्षर मिल कर 'दिन' लिखे जाने का उत्सव मना ही रहे थे कि बाजू में रखी दवात गिर गयी और पूरे पन्ने पर स्याही फैल गयी.

इस तरह दुनिया में पहली बार रात हुयी.

ईश्वर ने स्याही सोखने के भरपूर इंतज़ाम किये और चाँद तारे रच डाले. पर वह पन्ना अब कुछ भी लिखे जाने लायक नहीं बचा था.

ईश्वर करामाती प्राणी है. उसने पन्ना पलटा और 'सुबह' लिख दी.

एक बार वह मेरे स्वप्न में आया और मेरे कान में फुसफुसा कर 'दिन' और 'सुबह' का फ़र्क बता गया.

दिन की इबारत पढ़ते पढ़ते ही मेरे मुंह और हाथों में अमावसी स्याही छप गयी थी. ईश्वर फिर मेरे स्वप्न में आया और किसी तिलिस्मी झरने का पता बता गया, जिसका पानी नमकीन था.

उस झरने का पता ढूंढते ढूंढते कई जन्म गुज़र गए. मैं मुंह और हाथों में स्याही छपाए अलास्का से लेकर अलास्का तक गोल गोल घूमती रही. चलते चलते एक दिन थक कर निढाल हो गयी थी कि तभी किसी को अपने सामने खडा पाया. अपने हाथों का दोना बनाए नमकीन पानी लिए मेरे सामने कौन खडा था, मुझे नहीं पता. पर शायद सूर्य की  चमक को मद्धम कर अगर उसका चेहरा देख पाती तो निश्चित ही वो ऐसा ही दिखता.

मैंने उस जादुई पानी से मुंह और हाथ में छपी स्याही के दाग छुडाये और ईश्वर की डायरी का पन्ना पलट दिया.  अगले पन्ने पर ईश्वर का चमत्कार मुस्कुरा रहा था.

सुबह, मेरे आँगन में तुम्हारा स्वागत है ! ख़ुशामदीद !


(कल रात नींद में )


Tuesday, May 8, 2012

प्यास का होना ही है प्यास का बुझ जाना..

जुस्याना  कोपानिया  की लवर्स इन द रेन 

सीमाएं मानचित्र  पर खिंची आड़ी-टेढ़ी रेखाओं के सिवा कुछ भी नहीं . 

हवा की चादर के दो अलग-अलग पल्ले थामे हम दोनों जब इसे आसमान की ओर झटकते हैं, तब किस देश की सीमा बाधा डालती है ?

पता है , एक बार अपनी प्यास दिखाने के लिए मैंने रेगिस्तान का चित्र बनाना चाहा पर जब चित्र पूरा हुआ तब कैनवस पर प्रशांत महासागर हिलोरें मार रहा था.

'दूरी' लिखते हुए तुम मेरे सबसे निकट थे. रेगिस्तान बनाते हुए मैं सबसे ज्यादा भीगी हुयी थी.

दूरी और प्यास मेरी भाषा से विलुप्त हो रहे शब्द हैं.


 

Friday, March 23, 2012

समन्दर खारा होने की एक और कथा

एम एफ हुसैन  की पेंटिंग


प्रतिभा के लिए एक  नोट 

डियर प्रतिभा ,
तुमसे फोन पे कहा था न कि इस कहानी पर तुम्हारे लिखने  के  स्टाइल का इतना ज्यादा असर है कि इस का डी एन ए निकाला जाए तो तुम ही इसकी माँ निकलोगी . इसलिए अपनी पहली कहानी तुमको डेडिकेट करती हूँ.  देखो,  इसमें तुम्हारे जैसा परफेक्शन नहीं है ...अम्म्म....उम्म्म... हाँ, शायद इसलिए कि उलटे हाथ में पेन पकड़ कर लिखी है. ऐंवें ही . न लिखाई सधी न लिखना.  फिर भी जैसे मेरे सारे कूड़ा  करकट को गले से लगाती हो, इसे भी संभालो. 
प्रतिभा  के लिए बाबू की कच्ची सी  कोशिश है  - 'समंदर खारा होने की एक और कथा ' 

सुनो फिर क्या हुआ .........................................



उसने लड़की  की कमर में अदृश्य मंतर बाँध रखे थे.

लड़की दिन भर जंगल में आवारा तितलियों के पीछे दौडती और उनके रंग अपनी आँखों में उतारती. ऊँची चट्टानों को काट कर गिर रहे झरने के पानी को घंटों निहारती कि कहीं पानी का रंग पत्थर के लहू से लाल न हो जाता हो . कभी वह चिड़ियों के झुण्ड की ओर चली जाती और उन्हें उड़ने के गुर सिखाती. ऐसा करते हुए वह सख्ती से  अपने पैर ज़मीन पर जमाए रखती कि वह उड़ना जानती थी पर उड़ना चाहती नहीं थी. शाख से टूट कर गिरे पलाश के फूल उसके पैरों तले कुचले जाने की ख़्वाहिश लिए खिले रहते थे .हसरत भरे उन टेसुओं की मखमली दरी से पैर बचाकर लड़की नुकीले  कंकडों पर ही नाचती रहती. फूल कौतूहल भरी आँखों से उसे नाच की नदी में डूबता हुआ छोड़ देते . नाचते हुए उसकी सांसें तेज़ हो जातीं और उस जंगल का एक एक पत्ता किसी अलौकिक धुन में डूब जाता.

सांझ ढलते ही लड़की की कमर में बंधे मंतर अपनी गूँज से जंगल के बीचोबीच एक रास्ता बना देते और लड़की बौराई हुयी सी उस रास्ते पर चल पड़ती. मुश्किलों से भरे उस कच्चे रास्ते पर चलते हुए लड़की के पाँव छालों से भर जाते पर उसे दर्द का पता न चलता था. नीमबेहोशी जैसी हालत में चलते हुए उसे बस एक ही बात मालूम थी कि चलने के लिए होश नहीं पैरों में ललक की ज़रूरत होती है. लड़की जानती थी कि चलना भी एक तरह का इंतज़ार है. उसके पास पहुँच जाने का इंतज़ार जो उसे अपने टोटके बांध कर खींचता है. उस रास्ते पर चलने का इंतज़ार वह हर दिन किया करती थी.

उधर मंतर बाँधने वाला दुनिया से बेपरवाह घर की सीढ़ियों पर बैठा सिगरेट के छल्ले  हवा में उड़ा रहा होता.वो लड़की का प्रेमी था . आसमान की ओर उठती धुंए की टेढ़ी मेढ़ी चाल से वो अपनी बेफिक्री की इबारत लिखता. उसकी आँखों में इंतज़ार के जुगनू नहीं चमकते थे बल्कि  जूनून की लौ लगातार जल रही होती थी. उसके आस पास कभी अँधेरा नहीं होता था. ऐसा लगता जैसे  ख़ुदा ने दुनिया में उजाले का बंदोबस्त करने के लिए लड़की के प्रेमी को भेजा था. जहां दिन भर सूरज आसमान में जला करता वहीं रात भर धरती पर वो जल कर राख होता रहता.

लड़की उसके प्रेम से इस क़दर भरी हुयी थी कि छलक रही थी. उसने वक़्त को अपने पाँव में पहन लिया था. आसमान के शामियाने तले जब वह दरवेशों  की तरह घूमते  हुए एक हाथ ऊपर उठा लेती तब उसके पाँव से लिपटे वक़्त की पाज़ेब बज उठती.

लड़की के रहने के लिए पहाड़ों के पीछे उसने एक अनोखा घर बना रखा था. चुम्बनों की ईंट एक के ऊपर एक रख कमरे की दीवारें बनाईं थी. स्वर्ग के सबसे गहरे और अब तक के अनदेखे रंगों से उन दीवारों को रंगा था. खिडकियों पर धुनों के पर्दे टाँगे थे. घर के बाहर एक बाग़ था जहां रंग बिरंगे ख़्वाब उगे हुए थे. लड़की जानती थी कि वो दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत घर में रह रही है. ऐसा घर तो उन्हें भी नसीब नहीं जिनके पास ज़मीन से आसमान तक दौलत का अंबार लगा हुआ है. अपनी क़िस्मत पर इतराते हुए वह अपना नाच जारी रखती.

कभी कभी वो दरख्तों की आड़ से लड़की को ज़िन्दगी का जश्न मनाते देखा करता था. ऐसा करना उसे अच्छा लगता. जंगल में नाचती हुयी लड़की पर जब सूरज की किरणें बरसतीं तब वह  तन पर हल्दी लपेटी दुल्हन सी दिखती. 

उस दिन भी लड़की  कुदरत के जलसे में शामिल थी कि एकाएक वो सामने आ गया. जाने उसे क्या हुआ कि वो  लड़की को बेसाख्ता खींचते हुए घर ले आया. आख़िर लड़की को धूप भी कैसे छू सकती है ? वो यह बर्दाश्त न कर सका .  लड़की तो पूरी तरह से उसकी है. आख़िर धूप,  पानी की बूंदों और हवा को भी उसे छूने का क्या हक़ ? फिर ऐसा ही सिलसिला आगे भी चला. अब बारिश और वसंत के मौसम में लड़की का बाहर निकलना बंद हो गया.

..और फिर एक दिन उसने अपने प्यार से मौसम रचे कि बाहर के मौसम लड़की की छाया भी न छू सकें.  अपनी देह के ताप से उसने लड़की के लिए धूप रची. अपने आंसुओं से घर के भीतर ही बारिश की झड़ी लगाई और लड़की के मुंह में अपनी साँसे भर कर उसे जीने के लायक हवा दी.

लड़की फिर जी उठी . अब वो घर में भीतर  ही नृत्य करती. उसने  पाँव में बंधा वक़्त उतार कर बाहर फेंक  दिया. घर के भीतर ही अब सारे मौसम एक ही दिन में बारी बारी से खिल उठते.

लड़की की उंगलियाँ तिलिस्मी थी. वो पियानो बजाने की मुद्रा में हवा में उंगलियाँ चलाती थी. अक्सर वो नींद में ऐसा करती और जैसे ही उसकी उंगलियाँ हवा के पियानो पर थिरकतीं , खिडकियों पर पड़े धुनों के परदे फड़फडाने लगते. दुनिया में ऐसा पहली बार हो रहा था कि हवा में उंगलियाँ चलाने पर खगोलीय घटनाएं हो रही थीं. आसमान में तारों और उल्काओं की  आतिशबाज़ी होती.

इस  अनोखे तरह के संगीत की ख़बरें  फैलने लगीं और उनके घर के आसपास तमाशबीन इकट्ठे होने लगे. आसमानी आतिशबाज़ी और धुनों का जादू दुनिया भर के लोगों के सर चढ़ कर बोल रहा था. लड़की जानबूझ कर कोई जादू न करती. वो तो खुद किसी जादू की गिरफ़्त में थी . उसे पता भी न चलता कि कब  नींद की स्लेट पर वह सुरों के सम लिख जाती .

इधर वो दिन रात बेचैन रहने लगा. लड़की  के इर्द गिर्द उसे लोगों का हुजूम बिलकुल अच्छा न लगता. जिसे देखने और छूने का हक मौसमों को भी न हो, उसे भला किसी की नज़र कैसे छू सकती थी ?

उस दिन आसमान से फिर सितारों का झरना सा बहा आ रहा था और फ़रिश्ते आँखें  मूंदे  लड़की की हथेली पर लकीरें खींच रहे थे. पूरी क़ायनात धुनों के जादू का मंजर देख रही थी कि अचानक ज़मीन पर लाल रंग टपकने लगा. एकाएक राग बदल गया. ख़ुदा के दरवाज़े पर टंगे घड़ियाल बज उठे.  दुनिया में अफ़रा तफरी के हालात बन गए. फूलों ने खिलने से इनकार कर दिया. तितलियाँ अपने रंग छुटाने लगीं.  पेड़, जंगल, पहाड़ सन्न खड़े रह गए .

उसकी  आँखों का जूनून एक चाक़ू ने अपनी धार पर जब्त कर लिया और लड़की की उंगलियाँ कट कर गिर गयीं. खून से तर उँगलियों का दर्द लड़की न सह सकी और इस दुनिया से रुखसत हुयी. वो धूप, हवा और बारिश बनाने का हुनर तो जानता था पर उसे मरे हुए को ज़िन्दगी देने का कोई पता न था.

उस दिन के बाद उसकी आँखें कभी नहीं सूखीं.

लड़की मर के भी उसके सीने में ज़िंदा रहती थी और वो जीते जी मर चुका था. तब से जाने कितने जनम गुज़रे, वो लड़की की लाश उठाये दुनिया भर में फिरता है. उसके आंसुओं से समंदर भरते हैं. रातों को समन्दर के कलेजे में उठने वाली ऊंची ऊंची मौजें उसका रूदन हैं.

कहते हैं इसके पहले समन्दर का पानी मीठा था.